विदेशी मीडिया में पीएम मोदी बने तानाशाह
नहीं भायी राम लाला की प्राणप्रतिष्ठा विदेशी मीडिया को
जमकर उगला राम मंदिर के खिलाफ नफरती जहर
कोर्ट के फैसले को भी बताया मोदी-योगी का बुलडोजर
न्यू योर्क्सटाइम,अल जजीरा,वाशिंगटन पोस्ट ने उगला जाती का जहर
इस खबर को जरा ध्यान से सुनियेगा जिस तरीके से विदेशी मीडिया के जहन में राम मंदिर के लिए जो जहर उगला है सुनकर आप भी दांतो टेल ऊँगली दवा लेंगे,,
जबी भारत के पीएम मोदी तमाम सरे गुरुओं के साथ अयोध्या पर राम मंदिर में आराध्य राम की प्राण प्रतिष्ठा कर रहे थे तब विदेशों में बैठी मीडिया भारत की न्यायक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रही थी और न्याय की प्रक्रिया को ही मोदी-योगी का बलडोज़र बताने में लग हुई थी..
कोर्ट में लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार २२ जनुअरी को रामलला अयोध्या में विराजमान हो गए हैं। देश-विदेश की मीडिया में सिर्फ राम नाम ही छाया हुआ था,,लेकिन अमेरिका जैसे राज्यों में छपने वाले अख़बार द न्यू योर्क्स टाइम और तमाम सरे अख़बार भारत में रह रहे मुस्लिम समाज पर अत्याचार की डींग मार रहे थे,
व्ही द वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार,रिपोर्ट में कहा गया है कि मंदिर का निर्माण एक प्राचीन मस्जिद के ऊपर किया गया है। अधिकांश राजनीतिक विपक्षी नेता मंदिर के उद्घाटन का बहिष्कार कर रहे हैं। इनका कहना है कि यह धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए शोभा नहीं देता। हालांकि, राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने वालों की सूची में कई बड़े नाम हैं, जैसे- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उद्योगपति मुकेश अंबानी और गौतम अडानी और बॉलीवुड सुपरस्टार अमिताभ बच्चन। इसमें कहा गया है कि आगामी आम चुनाव से पहले, मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी देश के हिंदू बहुमत की पैरवी करने के लिए समारोह का उपयोग कर रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, भगवान राम के भक्त सिर्फ भारत में ही नहीं हैं। बल्कि थाईलैंड, इंडोनेशिया, म्यांमार और मलेशिया जैसे देशों में भी राम की शक्ति को पूजा जाता है।
अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, 32 साल की युसरा हुसैन ने कहा कि जब वह अयोध्या के राम मंदिर में प्रवेश करने के लिए कतार में खड़ी थीं, तब जो हुआ वह उनके जहन में अभी भी है। उन्होंने कहा, ‘मुझे देखते ही लोगों ने जय श्री राम का जाप करना शुरू कर दिया। मुझे आक्रामक विजयवाद की भावना देखने को मिली।’
अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को भारत की धर्मनिरपेक्ष नीति और आम चुनावों से जोड़कर पेश किया है।














